कल गुलज़ार के नज्मों की ऐक किताब लिए बैठा था | पन्ने पलट ही रहा था की इस Black and White नज़्म से मुलाक़ात हुई | मनो मेरी ही काहानी लिए कब से उन पन्नो में जा छुपा बैठा है | गुलज़ार की नज्में बहुत रंगबिरंगी होती हैं, पर इसमें मुझे ऐक सुना सा चेहरा नज़र आया | दुनिया से लड़ते लड़ते छिल गया था, थक गया था |
कितनी गिरहें खोली हैं मैंने... कितनी गिरहें बाकी हैं...
पाँव में पायल, बाहों में कंगन
गले में हँसली, कमरबंद, छल्ले और बिछुए
नाक, कान छिदवाए गए
और ज़ेवर-ज़ेवर कहते-कहते
रीत रिवाजों की रस्सियों से में जकड़ी गई
उफ़! कितनी तरह मैं पकड़ी गई
अब छिलने लगे हैं हाथ पाँव
और कितनी खराशें उभरी हैं
कितनी गिरहें खोली हैं मैंने... कितनी गिरहें बाकी हैं...
कितनी सच बात कही है गुलज़ार ने!
खुली हुई है कुछ गिरहें मेरी भी
टूटे हुए हैं धागे कई
ज़ेवर बिखरे पड़े हैं मेज़ पर
और ऐक दिल रखा हुआ है
उस पुरानी सी अलमारी में...