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Tuesday, January 31, 2012

Mutilated and Scattered





तोड़ आया था मैं कल
कुछ ख्वाब
और उनके साथ कुछ सपने

जला दिए थे मैं कल
कुछ ख़त
और उनके साथ वह लम्हे

फाड़ दीं थी मैंने कल
वह तस्वीर
और उसके साथ जुड़े वह पल

कुचल आया था मैं कल
ऐक दिल
और उसके लाखों अरमां

काट आया था मैं कल
ऐक रिश्ता
और उसकी नसें

जलाई दीं मैंने कल
वह लाशें

बिखरा कर आ रहा हूँ
उसके अवशेष

अख़बार में पढ़ लेना कल
मेरे मौत का चर्चा |

Mutilated and Scattered. 
Some Dreams. Some Letters. Some Photographs. A Heart. A Relationship.
I had cremated a cadaver yesterday.  
Do read it tomorrow. The story of my Death.


Wednesday, November 30, 2011

ख़ामोशी का वो भयानक चेहरा





नहीं कर पाई कुछ
वह भीड़ बस खड़ी रही
एक टक देखती रही
पर नहीं कर पाई कुछ

एक आवाज़ उठी थी कहीं से
पर डर के धार ने चीर के रख दिया उसे
उठे थे कुछ सर
कई हाथों ने हल्ला भी बोलना चाहा
काट के गिरा दिए गए ज़मीन पर

कोई नहीं आया बचाने उन्हें 
किसी ने नहीं बढ़ाये अपने कदम
मनो कोई तमाशा देख रहे हों
खून टपक रहा था कटे हुए गर्दनो से
मनो की लोग सिक्कों की बौछार कर रहे हों 

तमाशा हुआ ख़त्म 
घर चली गयी भीड़
चैन की नींद सोने को 
कल ऐक बार फिर सजेगा मंच 
कल ऐक बार फिर से सिक्के बरसेंगे 

Last year I had tried to render a silent conversation in my words.

ख़ामोश रहकर भी वह ख़ुशी बाँट रहे हैं
और हम...
बात करते हैं तो
लोग रोते हैं | लोग मरते हैं |

And this year, the silence has come back to haunt me, donning a different mask. 
Of indifference. Of ignorance. Of fear.

A silence that watches a murder and yet be calm about it. 
A silence that pierces the soul. Murders it. Buries it deep.

Now I yearn for a voice amidst this deafening silence.

ख़ामोशी से डर लगता है अब |


Sunday, October 24, 2010

ख़ामोशी



 मेरी ट्रेन बांद्रा पे आकर रुकी थी
स्टेशन पर मैंने फिर उन दोनों को देखा
रोज़ देखता हूँ
अगले प्लेटफ़ॉर्म पर चर्चगेट फास्ट का इंतज़ार करते हैं दोनों
किसी कॉलेज के छात्र हैं शायद.
सीढ़ी के पास वाले बेंच पर बैठकर
भीड़ से अनजान दोनों
एक दुसरे के बातों में उलझे रहते हैं
किस्से कहानियां हसना हँसाना
रोज़ देखता हूँ

मेरी ट्रेन बांद्रा पे आके रुकी थी
सिग्नल नहीं मिला था आज
स्टेशन पर मैंने फिर उन दोनों को देखा
रोज़ देखता हूँ 
अगले प्लेटफ़ॉर्म पे बेंच पर बैठे थे दोनों
वोही भीड़ थी, जिससे दोनों अनजान थे
वही हंसी थी, वही किस्से

आज उन्हें कुछ देर तक मैं देखता रहा
वह साइन लेंगुएज का प्रयोग कर रहे थे
मेरी ट्रेन चल पड़ी
काफी देर तक सोचता रहा

खामोश रहकर भी वह ख़ुशी बाँट रहे हैं
और हम...
बात करते हैं तोह
लोग रोते हैं, लोग मरते हैं

Each day as my train halts at the Bandra station, I see two friends. Oblivious of the crowd, immersed in their own world. Laughing. Smiling. At times, Giggling. 
Today my train had been at the station for a little too long. They were sitting there as usual. It was today that I saw them using sign language. 
Made me think. Their disability in no way stopped them from sharing happiness.
And us with the 'gift'?
When we speak. People Cry. People Die.